. It mentions the thirst of the children, the bravery of the companions, and the specific details of Imam Hussain's martyrdom. Universal Mourning
इतिहासकारों और विद्वानों के अनुसार, यह ज़ियारत इमाम-ए-ज़माना के विशेष दूतों (नुअब्बा-ए-अरबा) के माध्यम से मोमिनों तक पहुँची। यह केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि कर्बला की घटना का एक आंखों देखा वर्णन (Eyewitness account) जैसा अनुभव प्रदान करती है। इसमें इमाम हुसैन (अ.स.) की शहादत के पहले और बाद के दृश्यों को शब्दों में पिरोया गया है। मुख्य विषय और सामग्री
ज़ियारत ए नाहिया की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका उद्गम स्वयं बारहवें इमाम, इमाम मेहदी (अ.त.फ.श.) से माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यह ज़ियारत उनके द्वारा पढ़ी गई थी और उनके चार विशेष प्रतिनिधियों (नवाब अरबा) के माध्यम से हम तक पहुंची है। 'ज़ियारत ए नाहिया अल-मुक़द्दसा' शीर्षक का एक अन्य ज़ियारत भी प्रसिद्ध है, जिसका नाम 'ज़ियारत अल-शोहदा' है।
(मफ़ातीह अल-जिनान), which contains the full text and Urdu/Hindi translations. of a specific section or a link to a
इस्लामी विद्वानों और हदीस की किताबों के अनुसार, ज़ियारत-ए-नाहिया के दो मुख्य रूप (वर्जन) मिलते हैं: ziyarat e nahiya in hindi
ज़ियारत-ए-नाहिया पढ़ने के कई उद्देश्य हैं:
मैं गवाही देता हूँ कि आप शहीद हुए, और आपके अहले-बैत (परिवार) को कैद किया गया, और आपके खून को बहाया गया अत्याचारियों क
हे अल्लाह, मैं आपका दास हूँ, मैं आपके पास आया हूँ, मैं आपके लिए अपने प्रेम और श्रद्धांजलि व्यक्त करने आया हूँ, मैं आपके साथ जुड़ने और आपके प्रेम को व्यक्त करने आया हूँ।"
इस ज़ियारत में इमाम फ़रमाते हैं कि "अगर ज़माने ने मुझे देर से पैदा किया और मैं कर्बला में आपकी मदद न कर सका, तो मैं सुबह-शाम आप पर आँसू बहाऊँगा और आँसुओं के बजाय खून रोऊँगा।" of a specific section or a link to
ज़ियारत-ए-नाहिया की कुछ प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं: सलाम और सम्मान:
यह ज़ियारत कर्बला की महिलाओं और बच्चों पर हुए जुल्मों का भी ज़िक्र करती है। खै़मों (तंबुओं) का जलना और बीबियों की बेबसी का वर्णन दिल को झकझोर देने वाला है। शत्रुओं पर लानत:
ज़ियारत की शुरुआत हज़रत एडम (आदम) से लेकर हज़रत मोहम्मद (स.अ.व.व.) तक के सभी महान पैगंबरों पर सलाम भेजने से होती है। यह दर्शाता है कि इमाम हुसैन का मिशन सभी पैगंबरों के मिशन का ही विस्तार था।
(Ziyarat-e-Nahiya) इमाम महदी (अ.त.फ.) की ओर से वह विशेष ज़ियारत है जो आपने अपने शिया अनुयायियों के लिए निर्धारित की है ताकि वे करबला के शहीदों, विशेषकर इमाम हुसैन (अ.स.) की ज़ियारत कर सकें। इसे 'मुफाज्जल बिन उमर' के माध्यम से नस्ल के साथ प्राप्त हुआ है। इस ज़ियारत में इमाम हुसैन (अ.स.) और उनके साथियों के शहादत के दृश्यों का बड़ा ही भावुक और दिल दहला देने वाला वर्णन है। मैं आपका दास हूँ
इसमें यह बताया गया है कि इमाम हुसैन की शहादत पर केवल इंसान ही नहीं, बल्कि फरिश्ते, जिन्नात, ज़मीन और आसमान की हर चीज़ रोई है。 आध्यात्मिक गहराइयाँ
इसे रोज़े के हालत में और रोने की हालत में पढ़ना बहुत अफज़ल माना गया है।
: It shifts from general salutations to a personal oath of allegiance, where the reciter expresses a desire to have been present in Karbala to shield the Imam from arrows and swords. Ziyarat-e-Nahiya in Hindi (Transliteration & Meaning)